देश के प्रतिष्ठित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों यानी IITs में पिछले पांच वर्षों के दौरान 53 छात्रों की मौत दर्ज की गई है। इनमें 45 मामले आत्महत्या के हैं, जबकि आठ मौतें अन्य अप्राकृतिक कारणों की श्रेणी में दर्ज की गईं। यह आंकड़ा ऐसे समय सामने आया है जब देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य, शैक्षणिक दबाव और छात्र कल्याण व्यवस्था को लेकर लगातार चर्चा हो रही है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2020-21 में पांच, 2021-22 में छह, 2022-23 में छह, 2023-24 में 17 और 2024-25 में 19 छात्रों की मौत दर्ज की गई। यानी पांच साल की अवधि में शुरुआती तीन वर्षों की तुलना में अंतिम दो वर्षों में मौतों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज हुई।
45 आत्महत्याओं ने बढ़ाई चिंता
कुल 53 मौतों में 45 को आत्महत्या के रूप में दर्ज किया गया है। यह संख्या IIT परिसरों में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और संकट की स्थिति में उन्हें मिलने वाली सहायता को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है। हालांकि, किसी भी छात्र की आत्महत्या के पीछे केवल पढ़ाई या परीक्षा के दबाव को कारण मानना उचित नहीं होगा। प्रत्येक घटना के पीछे व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और अन्य परिस्थितियां हो सकती हैं।
SC, ST और OBC वर्ग के 29 छात्र
आंकड़ों का एक महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक वर्ग से भी जुड़ा है। पांच वर्षों में हुई 53 मौतों में 29 छात्र SC, ST और OBC वर्गों से संबंधित थे। वहीं, आत्महत्या के 45 मामलों में 28 छात्र इन तीन सामाजिक वर्गों से थे।
इन आंकड़ों के बाद IIT परिसरों में छात्रों के लिए उपलब्ध सहायता व्यवस्था, काउंसलिंग और शिकायत निवारण प्रणाली को लेकर भी चर्चा तेज हुई है। हालांकि, आंकड़े यह अपने आप साबित नहीं करते कि इन छात्रों की मौत का कारण उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि थी।
तीन IIT में सात-सात मौतें
संस्थानवार आंकड़ों में IIT खड़गपुर, IIT दिल्ली और IIT हैदराबाद में पांच वर्षों की अवधि के दौरान सात-सात छात्रों की मौत दर्ज की गई। अन्य IIT परिसरों में भी छात्रों की मौत के मामले सामने आए हैं।
बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच छात्र कल्याण चुनौती
IIT में प्रवेश के लिए छात्रों को देश की सबसे कठिन प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में से एक से गुजरना पड़ता है। प्रवेश के बाद भी अकादमिक प्रदर्शन, परीक्षाओं, प्रोजेक्ट, शोध, इंटर्नशिप और भविष्य के करियर को लेकर अपेक्षाएं बनी रहती हैं। हालांकि, इन परिस्थितियों को आत्महत्या की घटनाओं का एकमात्र कारण बताना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।
छात्र कल्याण विशेषज्ञों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि मानसिक स्वास्थ्य सहायता केवल संकट की स्थिति में उपलब्ध न हो, बल्कि उसे संस्थान की नियमित व्यवस्था का हिस्सा बनाया जाए। समय पर काउंसलिंग, प्रशिक्षित विशेषज्ञों तक आसान पहुंच, शिक्षकों के साथ संवाद और छात्रों के लिए सुरक्षित शिकायत तंत्र इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
सरकार ने जारी किए मानसिक स्वास्थ्य संबंधी दिशा-निर्देश
उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों के भावनात्मक और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर शिक्षा मंत्रालय ने दिशा-निर्देश और संसाधन उपलब्ध कराए हैं। इनका उद्देश्य संस्थानों में छात्रों के लिए अधिक सहयोगी और सुरक्षित वातावरण तैयार करना है।
इसके साथ ही उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्र आत्महत्या के मामलों को रोकने के लिए मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने और छात्रों की समस्याओं की समय रहते पहचान करने पर भी जोर दिया जा रहा है।
आंकड़ों से आगे समाधान की जरूरत
पांच वर्षों में 53 छात्रों की मौत और इनमें 45 आत्महत्याओं का आंकड़ा निश्चित रूप से गंभीर है। लेकिन इस आंकड़े को केवल संख्या के रूप में देखने के बजाय यह समझना भी जरूरी है कि प्रत्येक मामले के पीछे एक अलग मानवीय परिस्थिति रही होगी।
IIT जैसे संस्थानों में छात्रों की सफलता केवल अच्छे अंक, डिग्री या प्लेसमेंट तक सीमित नहीं हो सकती। छात्रों की सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और उन्हें आवश्यकता के समय सहायता मिलना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। ऐसे में इन घटनाओं के कारणों की निष्पक्ष जांच के साथ-साथ संस्थानों में प्रभावी मानसिक स्वास्थ्य और छात्र सहायता प्रणाली को लगातार मजबूत करना महत्वपूर्ण होगा।
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