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Friday, February 27, 2026

शिक्षा निदेशालय ने बुधवार को सीएम श्री स्कूलों की 6, 9 और 11वीं कक्षा में दाखिला प्रक्रिया को लेकर घोषणा कर दी है। इस साल कुल 75 सीएम श्री स्कूलों में दाखिले के लिए 27 फरवरी से आवेदन प्रक्रिया शुरू होगी, जो कि रात 12 मार्च तक चलेगी

शिक्षा निदेशालय ने बुधवार को सीएम श्री स्कूलों की 6, 9 और 11वीं कक्षा में दाखिला प्रक्रिया को लेकर घोषणा कर दी है। इस साल कुल 75 सीएम श्री स्कूलों में दाखिले के लिए 27 फरवरी से आवेदन प्रक्रिया शुरू होगी, जो कि रात 12 मार्च तक चलेगी

पूरी आवेदन प्रक्रिया ऑनलाइन होगी। शिक्षा निदेशालय की आधिकारिक वेबसाइट www.edudel.nic.in पर जाकर आवेदन कर सकते हैं।
सरकार ने सीएम श्री स्कूलों में दाखिले को लेकर गाइडलाइंस भी जारी की हैं। इन स्कूलों में सिर्फ दिल्ली के रहने वाले बच्चे ही आवेदन कर सकते हैं। उपलब्ध सीटों में से 50 प्रतिशत सीटें सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए आरक्षित होंगी। इसके अलावा बाकी 50 प्रतिशत सीटों पर निजी स्कूलों के बच्चों को भी मेरिट के आधार पर दाखिला मिल सकता है।
शैक्षणिक सत्र 2025–26 में 5, 8 और 10वीं कक्षा में दिल्ली के मान्यता प्राप्त स्कूल पास होना चाहिए। सामान्य वर्ग के छात्रों को न्यूनतम 25 प्रतिशत अंक प्राप्त करने होंगे, जबकि आरक्षित वर्ग में 5 प्रतिशत की राहत रहेगी। दाखिला मेरिट के आधार पर होगा। आवेदन फॉर्म भरते समय छात्रों को स्कूलों की चॉइस मिलेगी।
क्लास के बच्चे दो स्कूल और 9, 11वीं के स्टूडेंट 3 स्कूलों को विकल्प के तौर पर आवेदन फॉर्म में भर सकते हैं। हालांकि एक बार स्कूल आवंटित होने के बाद ट्रांसफर की अनुमति नहीं होगी।
शिक्षा विभाग के मुताबिक, 6 और 9वीं कक्षा की परीक्षा मार्च के अंतिम सप्ताह में आयोजित की जाएगी। वहीं, कक्षा 11 की परीक्षा मई 2026 में होने की संभावना है।
कक्षा 6 और 9 की प्रवेश प्रक्रिया 30 अप्रैल 2026 तक पूरी कर ली जाएगी।
OMR शीट आधारित इस परीक्षा में कक्षा 6 के लिए 300 नंबर के 75 प्रश्न होंगे, जबकि कक्षा 9 और 11 में दाखिले के लिए 400 अंक के 100 प्रश्न होंगे।

Thursday, February 26, 2026

साउथ एशियन यूनिवर्सिटी में बीए, एलएलबी (ऑनर्स) और बीबीए एलएलबी (ऑनर्स) कोर्स शुरू किए हैं

साउथ एशियन यूनिवर्सिटी (SU) सार्क देशों की सरकारों द्वारा स्थापित यूनिवर्सिटी ने वर्ष 2026-27 सत्र के लिए कई नए शैक्षणिक कार्यक्रम शुरू किए हैं।

इस वर्ष यूनिवर्सिटी ने कुल 1610 सीटों पर प्रवेश खोला है। इसमें 50 पीएचडी छात्रवृत्ति सीटें, 780 स्नातक और 780 स्नातकोत्तर कार्यक्रमों की सीटें शामिल हैं। एसएयू के अध्यक्ष प्रो. केके अग्रवाल ने इसकी जानकारी दी।

उन्होंने बताया कि अपने 16वें शैक्षणिक वर्ष में प्रवेश कर रही यूनिवर्सिटी ने स्नातक स्तर पर बीए, एलएलबी (ऑनर्स) और बीबीए एलएलबी (ऑनर्स) कार्यक्रम शुरू किए हैं।







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Wednesday, February 25, 2026

गुरु गोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय (GGSIPU) के बीटेक प्रोग्राम में इस साल से सीयूईटी स्कोर से भी दाखिले होंगे

गुरु गोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय (GGSIPU) के बीटेक प्रोग्राम में इस साल से सीयूईटी स्कोर से भी दाखिले होंगे। हालांकि दाखिले में यह स्कोर दूसरी प्राथमिकता पर रहेगा। बीटेक में दाखिले पहले राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा पर होंगे। यूनिवर्सिटी के तीन दर्जन से ज्यादा यूजी में दाखिले सीयूईटी स्कोर से भी होते हैं, प्राथमिकता पहले राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा या यूनिवर्सिटी से आयोजित परीक्षाओं को दी जाती है।

नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने सीयूईटी यूजी के लिए आवेदन की अंतिम तिथि को 26 फरवरी तक बढ़ा दिया है। ऐसे में आईपीयू की सलाह है कि जो छात्र सीयूईटी स्कोर से यूनिवर्सिटी के किसी स्नातक प्रोग्राम में दाखिला लेना चाहते हैं, वे सीयूईटी स्नातक के लिए आवेदन जरूर करें। सीयूईटी के अलावा कई पाठ्यक्रमों में प्रवेश राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं जैसे जेईई मेन, नीट, कैट, सीएमएटी, निमसेट, क्लैट के आधार पर भी होगा।

कुछ स्नातक और स्नातकोत्तर कार्यक्रमों के लिए खाली सीटें कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट सीयूईटी के माध्यम से भरी जाएंगी। यूनिवर्सिटी ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएचडी कार्यक्रमों में दाखिले के लिए आवेदन प्रक्रिया दो फरवरी से ही शुरू की थी।

130 से अधिक संबद्ध कॉलेजों और विश्वविद्यालय स्कूलों में 43,000 से अधिक सीटों पर दाखिले के इच्छुक छात्र स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएचडी के आवेदन कर सकते हैं।





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बीमार रहने के लिए छुट्टी चाहिए, या छुट्टी के लिए बीमार होना है?

हमारे देश में बीमारी भी बड़ी लोकतांत्रिक चीज़ है — यह कभी भी, कहीं भी, और किसी पर भी आ सकती है। लेकिन शिक्षण संस्थानों में तो बीमारी का स्वरूप कुछ अलग ही दिखाई देता है। यहाँ बीमारी अक्सर मौसम देखकर नहीं, बल्कि टाइम-टेबल देखकर आती है। और खास बात यह कि यह बीमारी छुट्टी के साथ ही ठीक भी हो जाती है।
कहावत है कि “स्वास्थ्य ही धन है”, पर कुछ लोग इसे इस तरह समझ बैठे हैं कि “छुट्टी ही स्वास्थ्य है।” इसलिए छुट्टी मिलते ही उनका स्वास्थ्य खिल उठता है, और काम दिखते ही तबीयत फिर से नाज़ुक हो जाती है।

बीमारी का वैज्ञानिक समय

अगर किसी फैकल्टी का पहला पीरियड सुबह 9 बजे हो, तो उसकी तबीयत रात 8 बजे से ही खराब होने लगती है। व्हाट्सऐप पर मैसेज आता है —
“सर, अचानक तेज बुखार है, आज नहीं आ पाऊँगा।”
और आश्चर्य देखिए, यही बुखार अगले दिन ठीक भी हो जाता है, खासकर तब जब उस दिन दो ही पीरियड हों या कोई मीटिंग न हो।
सबसे अद्भुत बीमारी तब आती है जब कॉलेज में कोई निरीक्षण, अतिरिक्त क्लास या पेपर-सेटिंग का काम हो। तब अचानक स्टाफ में वायरल का ऐसा प्रकोप फैलता है कि मेडिकल साइंस भी चकरा जाए। लगता है जैसे वायरस ने भी प्रशासन से मिलकर काम का कैलेंडर देख लिया हो।
डॉक्टर से ज़्यादा मजबूत मेडिकल सर्टिफिकेट
आजकल असली इलाज दवा से नहीं, मेडिकल सर्टिफिकेट से होता है। कुछ लोग इतने अनुभवी हो चुके हैं कि डॉक्टर से पहले ही बीमारी तय कर लेते हैं —
“डॉक्टर साहब, दो दिन का सर्टिफिकेट दे दीजिए, बाकी दवा मैं खुद ले लूँगा।”
डॉक्टर भी समझ जाते हैं कि यह बीमारी शरीर की कम, मन की ज्यादा है। पर क्या करें, मरीज की इच्छा सर्वोपरि है।

छुट्टी का गणित

शिक्षण संस्थानों में छुट्टी का गणित बड़ा रोचक है।
सोमवार को छुट्टी ले लो, तो रविवार मिलाकर लंबा वीकेंड।
शुक्रवार को छुट्टी ले लो, तो शनिवार-रविवार बोनस।
और अगर बीच में कोई त्योहार आ जाए, तो बीमारी की गंभीरता स्वतः बढ़ जाती है।
यह बीमारी इतनी समझदार होती है कि छुट्टी खत्म होते ही खुद ही ठीक हो जाती है। कोई टेस्ट नहीं, कोई रिपोर्ट नहीं — बस चमत्कार!

छात्रों का भी ज्ञान बढ़ता है

जब शिक्षक ही बीमारी का बहाना बनाकर छुट्टी लेते हैं, तो छात्र भी सीख जाते हैं कि बहाना बनाना भी एक कला है।
छात्र सोचते हैं —
“जब सर की तबीयत हर दूसरे शुक्रवार खराब हो सकती है, तो हमारी भी कभी-कभी हो ही सकती है।”
इस प्रकार शिक्षा केवल किताबों से नहीं, व्यवहार से भी मिलती है। और यह व्यवहार छात्रों को बहानेबाजी का पोस्ट-ग्रेजुएशन करा देता है।

काम का डर या आराम का प्यार?

असल सवाल यह है कि लोग सच में बीमार होते हैं या काम देखकर बीमार हो जाते हैं?
क्योंकि जब वही व्यक्ति स्टाफ रूम में बैठकर चाय पीता है, तो बिल्कुल स्वस्थ दिखता है, लेकिन जैसे ही अतिरिक्त जिम्मेदारी मिलती है, उसकी कमर दर्द करने लगती है, सिर चकराने लगता है, और आँखों में अँधेरा छाने लगता है।
कई बार तो बीमारी का नाम भी बड़ा आधुनिक होता है —
“सर, माइग्रेन हो गया है।”
“सर, एलर्जी है।”
“सर, डॉक्टर ने आराम बताया है।”
डॉक्टर बेचारे सोचते होंगे कि हमने आराम की सलाह कब दी, पर उनका नाम तो लग ही जाता है।
ईमानदार लोग भी परेशान
सबसे ज्यादा परेशानी उन लोगों को होती है जो सच में बीमार होते हैं।
जब वे छुट्टी लेते हैं, तो प्रशासन सोचता है —
“फिर वही बहाना!”
इस तरह बहानेबाजों की वजह से असली मरीजों की साख भी खराब हो जाती है।

प्रशासन की मजबूरी

प्रशासन भी क्या करे?
अगर छुट्टी मना कर दे तो मानवता पर सवाल, और छुट्टी दे दे तो काम पर असर।
इसलिए वह भी आधे मन से छुट्टी मंजूर कर देता है और मन ही मन सोचता है —
“काश, यह बीमारी छात्रों की पढ़ाई में भी थोड़ी गंभीर होती।”
समाधान क्या है?
समाधान बहुत कठिन नहीं है, बस थोड़ी ईमानदारी चाहिए।
अगर सच में बीमारी है तो आराम जरूरी है, लेकिन अगर छुट्टी ही चाहिए तो बीमारी का बहाना बनाना जरूरी नहीं।
कभी-कभी सच्चाई भी छुट्टी दिला सकती है —
“सर, थक गया हूँ, थोड़ा आराम चाहिए।”
कम से कम इससे मेडिकल साइंस को तो दोष नहीं देना पड़ेगा।

निष्कर्ष 

आज शिक्षण संस्थानों में बीमारी केवल स्वास्थ्य की समस्या नहीं रही, बल्कि छुट्टी का माध्यम बन चुकी है।
जब काम बढ़ता है तो बीमारी बढ़ती है, और जब जिम्मेदारी घटती है तो स्वास्थ्य लौट आता है।
इसलिए लगता है कि अब नया नारा होना चाहिए —
“स्वस्थ रहो या बीमार बनो, छुट्टी तो मिलनी ही चाहिए।”
पर सच तो यही है कि अगर शिक्षक ही जिम्मेदारी से भागने लगें, तो शिक्षा का स्वास्थ्य भी बीमार हो जाएगा।
और उस बीमारी का इलाज किसी डॉक्टर के पास नहीं, केवल कर्तव्यनिष्ठा के पास है।

Monday, February 23, 2026

कैंपस न्यूज: डॉ अखिलेश दास गुप्ता इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्ट्डीज (ADGIPS), बीबीडी समूह के अंतर्गत संचालित, नई दिल्ली, उत्कर्ष 2026 : “विरासत से विकास तक” थीम पर तीन दिवसीय वार्षिकोत्सव का भव्य आयोजन किया गया


कैंपस न्यूज: डॉ अखिलेश दास गुप्ता इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्ट्डीज  (ADGIPS), बीबीडी समूह के अंतर्गत संचालित प्रतिष्ठित संस्थान, में 19 से 21 फरवरी तक तीन दिवसीय वार्षिकोत्सव “उत्कर्ष 2026” का भव्य आयोजन किया गया। इस वर्ष के उत्सव की थीम “विरासत से विकास तक” रही, जिसका उद्देश्य भारतीय सांस्कृतिक धरोहर, विविधता और आधुनिक प्रगति के बीच संतुलन स्थापित करने का संदेश देना था। कार्यक्रम में दिल्ली-एनसीआर के विभिन्न कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और संस्थानों के विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
कार्यक्रम का उद्घाटन डॉ आभा वर्मानी , संयुक्त कुलसचिव, गुरु गोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी, दिल्ली द्वारा दीप प्रज्ज्वलन के साथ किया गया। अपने उद्घाटन संबोधन में डॉ. वर्मानी ने कहा कि भारत की शक्ति उसकी विविधता में निहित है। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे अपनी विरासत और सांस्कृतिक मूल्यों को समझें तथा उन्हें आधुनिक सोच के साथ जोड़कर समाज के विकास में योगदान दें। उन्होंने कहा कि “कश्मीर से कन्याकुमारी तक अनेक भाषाएँ, परंपराएँ और संस्कृतियाँ होते हुए भी हम एक सूत्र में बंधे हैं। यही हमारी राष्ट्रीय पहचान की सबसे बड़ी शक्ति है।”
संस्थान के निदेशक डॉ निरंजन भट्टाचार्य  ने अपने स्वागत भाषण में कॉलेज की शैक्षणिक उपलब्धियों, शोध गतिविधियों और नवाचार आधारित शिक्षा पर विशेष प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि संस्थान में शोध और मौलिक चिंतन को बढ़ावा देने पर विशेष बल दिया जाता है। उन्होंने कहा कि भारत की प्रगति तभी संभव है जब हम अपनी पहचान और ज्ञान परंपरा को समझते हुए नए विचारों को अपनाएँ। उन्होंने विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना भी होना चाहिए।
तीन दिनों तक चले इस उत्सव में अनेक सांस्कृतिक, शैक्षणिक और मनोरंजनात्मक कार्यक्रम आयोजित किए गए। इनमें शास्त्रीय और आधुनिक नृत्य, समूह गीत, वाद्य प्रस्तुति, नाटक, फैशन शो, वाद-विवाद प्रतियोगिता, क्विज़, तकनीकी प्रदर्शनियाँ और स्टार्ट-अप आइडिया प्रस्तुति जैसे कार्यक्रम शामिल रहे। विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग लेने वाले विद्यार्थियों ने अपनी प्रतिभा का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया और कार्यक्रम परिसर उत्साह, रंग और ऊर्जा से भर गया।
उत्सव के दौरान परिसर में पारंपरिक और आधुनिक कला का अनूठा संगम देखने को मिला। मंच सज्जा, प्रकाश व्यवस्था और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। आयोजन का उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल मनोरंजन ही नहीं बल्कि नेतृत्व, टीमवर्क और रचनात्मकता के अवसर प्रदान करना भी था। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में अभिभावकों, शिक्षकों और पूर्व छात्रों की भी उपस्थिति रही, जिससे आयोजन का माहौल और अधिक जीवंत हो उठा।
समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में मिस सोनाक्षी दास, उपाध्यक्ष, BBD Group उपस्थित रहीं। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि ऐसे आयोजन विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने संस्थान के संकाय सदस्यों, कर्मचारियों और विद्यार्थियों को इस सफल आयोजन के लिए बधाई दी तथा पुरस्कार विजेताओं को प्रमाण-पत्र और नकद पुरस्कार प्रदान किए। इस अवसर पर “स्टूडेंट ऑफ द ईयर”, विधि, प्रबंधन और बी.टेक. के उत्कृष्ट विद्यार्थियों को विशेष सम्मान भी दिया गया। उन्होंने विद्यार्थियों के उत्साह और परिश्रम की सराहना करते हुए सोमवार को अवकाश की घोषणा भी की।
निदेशक डॉ. भट्टाचार्य ने अपने धन्यवाद ज्ञापन में प्रबंधन, बीबीडी समूह, उपाध्यक्ष महोदया तथा सभी सहयोगियों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि संस्थान की गुणवत्ता में निरंतर सुधार में प्रबंधन का मार्गदर्शन महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है और भविष्य में भी ऐसे आयोजन विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए जारी रहेंगे।
उत्सव के अंतिम दिन आयोजित स्टार नाइट कार्यक्रम ने पूरे समारोह को यादगार बना दिया। प्रसिद्ध गायिका Charu Semwal की प्रस्तुति ने दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया। उनके लोकप्रिय गीतों और ऊर्जावान प्रस्तुति ने माहौल को उत्सवमय बना दिया और विद्यार्थियों ने देर रात तक कार्यक्रम का आनंद लिया।
“उत्कर्ष 2026” ने एक बार फिर यह सिद्ध किया कि शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि संस्कृति, रचनात्मकता और सामाजिक चेतना के साथ जुड़कर ही उसका वास्तविक अर्थ सामने आता है। संस्थान द्वारा आयोजित यह तीन दिवसीय उत्सव विद्यार्थियों के लिए सीखने, अभिव्यक्ति और संवाद का सशक्त मंच बना, जिसने उन्हें अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए आगे बढ़ने का संदेश दिया।
इस प्रकार, “विरासत से विकास तक” की थीम को सार्थक रूप से साकार करते हुए ADGIPS का वार्षिकोत्सव सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ और सभी प्रतिभागियों के लिए अविस्मरणीय स्मृतियाँ छोड़ गया।
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Friday, February 20, 2026

धुंधली सच्चाई: निजी शिक्षण संस्थानों की चमकती तस्वीर

भारत में उच्च शिक्षा का क्षेत्र पिछले दो दशकों में  बहुत तेजी से बदला है। सरकारी संस्थानों की सीमित सीटों और बढ़ती जनसंख्या के कारण निजी कॉलेज, विश्वविद्यालय और संस्थानों का विस्तार हुआ। इन संस्थानों ने आधुनिक भवन, स्मार्ट क्लास, विदेशी सहयोग, 100% प्लेसमेंट और विश्वस्तरीय सुविधाओं के दावे करके विद्यार्थियों और अभिभावकों को आकर्षित किया। विज्ञापन, ब्रोशर और वेबसाइटों में सब कुछ अत्यंत आकर्षक दिखता है—परंतु जमीनी हकीकत अक्सर इन दावों से अलग होती है।

1. 100% प्लेसमेंट का दावा : आंकड़ों की बाज़ीगरी

आज अधिकांश निजी शिक्षण संस्थान अपने प्रचार में “100% प्लेसमेंट” को सबसे बड़ा हथियार बनाते हैं। परंतु इस दावे की वास्तविकता को समझना आवश्यक है। कई बार संस्थान अल्पकालिक इंटर्नशिप, कम वेतन वाली नौकरियों, या असंबंधित क्षेत्रों में नियुक्ति को भी प्लेसमेंट में शामिल कर लेते हैं। कई जगह विद्यार्थियों को केवल ऑफर लेटर दिखाकर प्लेसमेंट घोषित कर दिया जाता है, भले ही छात्र जॉइन न करे या कंपनी बाद में नियुक्ति रद्द कर दे।
कुछ संस्थानों में विद्यार्थियों को दबाव देकर छोटे स्टार्टअप या कॉल सेंटर जॉइन करवाए जाते हैं ताकि संस्थान का प्लेसमेंट प्रतिशत बना रहे। इस प्रकार प्लेसमेंट एक शिक्षा परिणाम नहीं बल्कि मार्केटिंग टूल बनकर रह गया है।

2. एक्रेडिटेशन और रैंकिंग की विश्वसनीयता पर सवाल

भारत में गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए कई संस्थाएं कार्यरत हैं, जैसे National Assessment and Accreditation Council, University Grants Commission और All India Council for Technical Education। इनका उद्देश्य शिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता, शोध, बुनियादी ढांचे और प्रशासनिक व्यवस्था का मूल्यांकन करना है।
परंतु कई बार देखने में आता है कि A++, A+ या अन्य उच्च ग्रेड प्राप्त संस्थानों की वास्तविक स्थिति उस स्तर की नहीं होती। कागजों पर शोध, सुविधाएं, स्टाफ संख्या और शैक्षणिक गतिविधियां प्रभावशाली दिखती हैं, लेकिन वास्तविकता में संसाधनों का उपयोग सीमित या प्रतीकात्मक होता है।
कुछ संस्थान निरीक्षण से पहले अस्थायी रूप से उपकरण खरीद लेते हैं, अतिरिक्त फैकल्टी को अस्थायी रूप से नियुक्त कर लेते हैं या रिकॉर्ड तैयार कर लेते हैं। निरीक्षण समाप्त होते ही व्यवस्थाएं पहले जैसी हो जाती हैं। इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या गुणवत्ता मूल्यांकन केवल दस्तावेज़ आधारित रह गया है?

3. उच्च फीस, कम वेतन – शिक्षा का व्यापारिक मॉडल

निजी संस्थानों की फीस लगातार बढ़ रही है। कई कॉलेज अपने शुल्क निर्धारण में सातवें वेतन आयोग, आधुनिक सुविधाओं और अंतरराष्ट्रीय स्तर की शिक्षा का हवाला देते हैं। परंतु यही संस्थान अपने शिक्षकों और कर्मचारियों को उस स्तर का वेतन नहीं देते। फैकल्टी से अपेक्षा की जाती है कि वे शोध करें, प्रोजेक्ट लाएं, छात्रों को प्रशिक्षित करें, एडमिशन बढ़ाएं और संस्थान की छवि सुधारें, परंतु वेतन अक्सर न्यूनतम स्तर पर होता है। कई संस्थानों में वेतन समय पर नहीं मिलता, पीएफ या अन्य लाभ अधूरे रहते हैं और नौकरी की स्थिरता भी नहीं होती। इस असंतुलन का परिणाम यह होता है कि योग्य शिक्षक निजी संस्थानों से जल्दी बाहर निकल जाते हैं या केवल अनुभव लेने के लिए काम करते हैं। इससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है, क्योंकि स्थायी और अनुभवी शिक्षकों का अभाव हो जाता है।

4. अनुबंध आधारित नियुक्ति : असुरक्षा का माहौल

आज अधिकांश निजी शिक्षण संस्थान स्थायी नियुक्तियों से बचते हैं। फैकल्टी और स्टाफ को अनुबंध पर रखा जाता है, जिसे कभी भी समाप्त किया जा सकता है। इसका प्रभाव दो स्तरों पर पड़ता है: शिक्षक अपने भविष्य को लेकर असुरक्षित रहते हैं। वे संस्थान की गलत नीतियों के खिलाफ आवाज उठाने से डरते हैं। जब शिक्षक स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर पाते, तब शिक्षा केवल औपचारिकता बन जाती है। शोध, नवाचार और अकादमिक स्वतंत्रता प्रभावित होती है। 

5. पुराने कर्मचारियों को हटाने की प्रवृत्ति 

कुछ संस्थानों में यह प्रवृत्ति देखी गई है कि जैसे ही कर्मचारी स्थायी लाभों—जैसे ग्रेच्युटी, प्रोविडेंट फंड या अन्य सुविधाओं—के पात्र होने लगते हैं, उन्हें किसी न किसी कारण से हटा दिया जाता है। यह न केवल कर्मचारी अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि संस्थान की नैतिकता पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है। शिक्षा संस्थान केवल ज्ञान देने के केंद्र नहीं होते, वे सामाजिक मूल्यों के प्रतीक भी होते हैं। यदि वहीं शोषण हो, तो समाज में गलत संदेश जाता है।

6. पढ़ाई से अधिक इवेंट मैनेजमेंट

आज कई निजी संस्थानों में शैक्षणिक गतिविधियों से अधिक ध्यान इवेंट्स, फेस्ट, सेमिनार और फोटो सेशन पर होता है। यह सही है कि सह-पाठ्यक्रम गतिविधियां महत्वपूर्ण हैं, परंतु जब वे शिक्षा का स्थान ले लें, तब समस्या पैदा होती है। कई संस्थानों में शिक्षक का मूल्यांकन पढ़ाने से अधिक इस आधार पर होता है कि उन्होंने कितने कार्यक्रम आयोजित किए या सोशल मीडिया पर संस्थान की कितनी प्रचार सामग्री डाली। इससे शिक्षा की मूल भावना प्रभावित होती है। छात्र भी ज्ञान के बजाय प्रमाणपत्र और इवेंट अनुभव को अधिक महत्व देने लगते हैं।

7. गुणवत्ता बनाम लाभ – बदलता उद्देश्य

शिक्षा का मूल उद्देश्य समाज का बौद्धिक और नैतिक विकास है। परंतु कई निजी संस्थानों के लिए शिक्षा अब निवेश और लाभ का साधन बन गई है। जब शिक्षा व्यवसाय बनती है, तब छात्र ग्राहक बन जाते हैं, शिक्षक कर्मचारी बन जाते हैं और ज्ञान उत्पाद बन जाता है। इस मॉडल में गुणवत्ता से अधिक महत्व ब्रांड, विज्ञापन और प्रवेश संख्या को दिया जाता है।

8. छात्रों पर प्रभाव

इन परिस्थितियों का सबसे अधिक असर छात्रों पर पड़ता है। उन्हें महंगी शिक्षा मिलती है पर गुणवत्ता सीमित रहती है। प्लेसमेंट अनिश्चित रहता है। व्यावहारिक ज्ञान कम मिलता है। जब छात्र शिक्षा में निवेश करते हैं, तो वे भविष्य की उम्मीद भी करते हैं। यदि संस्थान केवल प्रमाणपत्र दे और कौशल न दे, तो यह युवाओं के साथ अन्याय है।

9. समाधान क्या हो सकते हैं?

इस स्थिति को सुधारने के लिए कई कदम आवश्यक हैं:
(1) पारदर्शी प्लेसमेंट रिपोर्ट संस्थानों को वेतन, कंपनी और भूमिका सहित वास्तविक प्लेसमेंट डेटा सार्वजनिक करना चाहिए।
(2) निरीक्षण की वास्तविक प्रक्रिया एक्रेडिटेशन संस्थाओं को आकस्मिक निरीक्षण, छात्र और शिक्षक फीडबैक तथा डिजिटल ट्रैकिंग का उपयोग करना चाहिए।
(3) शिक्षक अधिकारों की सुरक्षा स्थायी नियुक्ति, समय पर वेतन और सामाजिक सुरक्षा लाभ अनिवार्य किए जाने चाहिए।
(4) फीस और सुविधाओं का संतुलन यदि संस्थान उच्च फीस लेते हैं, तो उन्हें उसी स्तर की शिक्षा और वेतन व्यवस्था भी देनी चाहिए।
(5) शिक्षा को व्यवसाय नहीं, सामाजिक दायित्व मानना सरकार, समाज और शिक्षा क्षेत्र को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल लाभ न हो।

निष्कर्ष

निजी शिक्षण संस्थानों ने भारत में शिक्षा के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, इसमें कोई संदेह नहीं। परंतु जब शिक्षा केवल दिखावे, रैंकिंग और मुनाफे तक सीमित हो जाए, तब उसकी आत्मा खो जाती है। जरूरत इस बात की है कि शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिकता को पुनः स्थापित किया जाए। एक अच्छा संस्थान वह नहीं जो केवल A++ ग्रेड ले आए, बल्कि वह है जो अपने छात्रों को ज्ञान, अपने शिक्षकों को सम्मान और समाज को जिम्मेदार नागरिक दे सके।



Monday, February 16, 2026

10वीं एवं 12वीं के छात्र-छात्राओं को बोर्ड परीक्षाओं के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं

प्रिय 10वीं एवं 12वीं के छात्र-छात्राओं,

आपकी बोर्ड परीक्षाओं का समय आ गया है। यह वह महत्वपूर्ण अवसर है जब आप अपनी मेहनत, लगन और आत्मविश्वास से अपने सपनों की दिशा तय करेंगे। याद रखिए, सफलता केवल प्रतिभा से नहीं बल्कि निरंतर प्रयास, अनुशासन और सकारात्मक सोच से मिलती है।
परीक्षा जीवन की अंतिम मंज़िल नहीं, बल्कि आगे बढ़ने का एक पड़ाव है। इसलिए घबराएँ नहीं, बल्कि शांत मन से प्रश्नपत्र पढ़ें, समय का सही प्रबंधन करें और अपने ज्ञान पर विश्वास रखें। आपने पूरे वर्ष जो परिश्रम किया है, वही इस समय आपकी सबसे बड़ी शक्ति बनेगा।

सकारात्मक सोच रखें, पर्याप्त विश्राम लें और आत्मविश्वास बनाए रखें। कठिन प्रश्नों से घबराएँ नहीं, बल्कि धैर्य और समझदारी से उनका सामना करें। याद रखें — हर प्रयास आपको सफलता के एक कदम और निकट ले जाता है।

हमारी ओर से आप सभी को उज्ज्वल भविष्य के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ। आशा है कि आप अपने श्रेष्ठ प्रदर्शन से न केवल अपने परिवार और विद्यालय का नाम रोशन करेंगे, बल्कि अपने सपनों को भी नई उड़ान देंगे।

आप सभी को बोर्ड परीक्षाओं के लिए ढेर सारी शुभकामनाएँ।

सफलता आपके कदम चूमे और आपका भविष्य उज्ज्वल बने।

शुभकामनाओं सहित


Sunday, February 15, 2026

Friday, February 13, 2026

आज शिक्षण संस्थान केवल “इवेंट मैनेजमेंट” संस्थान बनते जा रहे हैं


वर्तमान समय में शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। तकनीक, बाज़ारवाद और प्रतिस्पर्धा के इस दौर में शिक्षण संस्थानों की प्राथमिकताएँ भी परिवर्तित हुई हैं। जहाँ पहले विद्यालय और महाविद्यालय ज्ञानार्जन, चिंतन और चरित्र-निर्माण के केंद्र माने जाते थे, वहीं आज कई स्थानों पर वे “इवेंट मैनेजमेंट” संस्थानों की तरह दिखाई देने लगे हैं। वार्षिक उत्सव, सेमिनार, वेबिनार, सांस्कृतिक कार्यक्रम, स्पोर्ट्स डे, फेस्ट और विभिन्न दिवसों के आयोजन इतनी अधिक संख्या में होने लगे हैं कि मूल शैक्षणिक उद्देश्य कहीं पीछे छूटता सा प्रतीत होता है।
निस्संदेह, सह-पाठ्यक्रम गतिविधियाँ विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक हैं। वे आत्मविश्वास बढ़ाती हैं, नेतृत्व क्षमता विकसित करती हैं और सामाजिक कौशल को सुदृढ़ बनाती हैं। परंतु जब इन गतिविधियों का अनुपात इतना बढ़ जाए कि कक्षाओं का समय कम हो जाए, शिक्षकों पर केवल आयोजन की जिम्मेदारी आ जाए और अध्ययन-अध्यापन गौण हो जाए, तब यह चिंता का विषय बन जाता है। कई बार देखा गया है कि किसी निरीक्षण, मान्यता या प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से कार्यक्रमों की भरमार कर दी जाती है। मंच सजता है, फोटो और वीडियो बनते हैं, सोशल मीडिया पर प्रचार होता है, परंतु विद्यार्थियों की शैक्षणिक प्रगति पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता।
आज शिक्षा भी एक प्रतिस्पर्धी बाजार का हिस्सा बन चुकी है। संस्थान अपनी “ब्रांडिंग” के लिए आकर्षक कार्यक्रमों और बड़े-बड़े आयोजनों पर जोर देते हैं। बाहरी व्यक्तित्वों को बुलाकर भव्य कार्यक्रम किए जाते हैं ताकि संस्थान की छवि चमके। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या इससे विद्यार्थियों की बौद्धिक क्षमता और विषय-ज्ञान में वास्तविक वृद्धि हो रही है? कई बार आयोजन की तैयारी में शिक्षक और छात्र इतने व्यस्त हो जाते हैं कि नियमित पाठ्यक्रम प्रभावित हो जाता है। असाइनमेंट, प्रायोगिक कार्य और शोध गतिविधियाँ पीछे छूट जाती हैं।
एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि लगातार आयोजनों का दबाव शिक्षकों और कर्मचारियों पर मानसिक तनाव भी बढ़ाता है। उन्हें अपने मूल कार्य के अतिरिक्त मंच संचालन, अतिथि स्वागत, सजावट, प्रबंधन और रिपोर्टिंग जैसे कार्य करने पड़ते हैं। इससे उनकी ऊर्जा और समय का बड़ा भाग प्रशासनिक गतिविधियों में खर्च हो जाता है। परिणामस्वरूप, शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
यह भी सत्य है कि आधुनिक शिक्षा में प्रस्तुतीकरण और व्यवहारिक अनुभव का महत्व बढ़ा है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि शिक्षा केवल दिखावे तक सीमित रह जाए। वास्तविक शिक्षा वह है जो विद्यार्थियों में चिंतनशीलता, नैतिकता और शोध की प्रवृत्ति उत्पन्न करे। यदि संस्थान केवल प्रमाणपत्र, फोटो और सोशल मीडिया पोस्ट तक सिमट जाएँ, तो शिक्षा का मूल उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाएगा।
समाधान यह है कि शिक्षण संस्थान संतुलन बनाएँ। सह-पाठ्यक्रम गतिविधियाँ अवश्य हों, परंतु वे पाठ्यक्रम और शैक्षणिक गुणवत्ता के पूरक बनें, प्रतिस्थापक नहीं। शिक्षकों को उनके मूल कार्य—पठन-पाठन और मार्गदर्शन—पर केंद्रित रहने दिया जाए। प्रशासन को भी यह समझना होगा कि संस्थान की वास्तविक पहचान उसके परिणामों, शोध कार्यों और विद्यार्थियों के नैतिक विकास से बनती है, न कि केवल भव्य आयोजनों से।
अंततः, शिक्षा केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक सतत प्रक्रिया है। यदि हम इसे आयोजन-प्रधान बना देंगे, तो ज्ञान की गहराई और गंभीरता खोने का खतरा रहेगा। इसलिए आवश्यक है कि शिक्षण संस्थान अपनी मूल भावना—ज्ञान, संस्कार और व्यक्तित्व विकास—को केंद्र में रखें और आयोजनों को उसी के अनुरूप सीमित एवं सार्थक बनाएं।

Friday, February 6, 2026

NTA ने UGC-NET दिसंबर 2025 का रिजल्ट जारी

NTA ने UGC-NET दिसंबर 2025 का रिजल्ट जारी कर दिया है। इसके लिए 9.93 लाख रजिस्ट्रेशन हुए थे। 7.35 लाख स्टूडेंट्स ने परीक्षा दी थी। एनटीए ने सब्जेक्ट और कैटेगरी के हिसाब से कटऑफ मार्क्स भी जारी किए हैं।
सब्जेक्ट और कैटेगरी के हिसाब से कटऑफ भी जारी किए गए हैं।
जारी किए हैं। जेआरएफ और असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति के लिए, 5108 कैंडिडेट्स क्वालिफाई हुए हैं। पीएचडी में एडमिशन और असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति के लिए तय की गई कैटेगरी में 54713 कैंडिडेट्स क्वालिफाई हुए हैं। तीसरी कैटेगरी में 117058 कैंडिडेट्स ने एग्जाम क्लियर किया है।


Wednesday, February 4, 2026

भारतीय प्रबंधन संस्थान, इंदौर प्रबंधन में 5 वर्षीय एकीकृत कार्यक्रम बैच 2026-30

भारतीय प्रबंधन संस्थान, इंदौर प्रबंधन में 5 वर्षीय एकीकृत कार्यक्रम बैच 2026-30

दिल्ली विश्वविद्यालय ने NCWEB की पहली कट-ऑफ सूची जारी, 28 जुलाई से शुरू होगी ऑनलाइन प्रवेश प्रक्रिया

दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए नॉन-कॉलेजिएट विमेन एजुकेशन बोर्ड (NCWEB) के अंतर्गत संचालित बी.ए. (प्रोग्राम) ...

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Latest News दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के नॉन-कॉलेजिएट विमेन्स एजुकेशन बोर्ड (NCWEB) ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 के स्नातक प्रवेश का कार्यक्रम जारी कर दिया है। ऑनलाइन पंजीकरण प्रक्रिया 8 जुलाई 2026 से शुरू होकर 24 जुलाई 2026 तक चलेगी...