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Friday, February 13, 2026

आज शिक्षण संस्थान केवल “इवेंट मैनेजमेंट” संस्थान बनते जा रहे हैं


वर्तमान समय में शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। तकनीक, बाज़ारवाद और प्रतिस्पर्धा के इस दौर में शिक्षण संस्थानों की प्राथमिकताएँ भी परिवर्तित हुई हैं। जहाँ पहले विद्यालय और महाविद्यालय ज्ञानार्जन, चिंतन और चरित्र-निर्माण के केंद्र माने जाते थे, वहीं आज कई स्थानों पर वे “इवेंट मैनेजमेंट” संस्थानों की तरह दिखाई देने लगे हैं। वार्षिक उत्सव, सेमिनार, वेबिनार, सांस्कृतिक कार्यक्रम, स्पोर्ट्स डे, फेस्ट और विभिन्न दिवसों के आयोजन इतनी अधिक संख्या में होने लगे हैं कि मूल शैक्षणिक उद्देश्य कहीं पीछे छूटता सा प्रतीत होता है।
निस्संदेह, सह-पाठ्यक्रम गतिविधियाँ विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक हैं। वे आत्मविश्वास बढ़ाती हैं, नेतृत्व क्षमता विकसित करती हैं और सामाजिक कौशल को सुदृढ़ बनाती हैं। परंतु जब इन गतिविधियों का अनुपात इतना बढ़ जाए कि कक्षाओं का समय कम हो जाए, शिक्षकों पर केवल आयोजन की जिम्मेदारी आ जाए और अध्ययन-अध्यापन गौण हो जाए, तब यह चिंता का विषय बन जाता है। कई बार देखा गया है कि किसी निरीक्षण, मान्यता या प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से कार्यक्रमों की भरमार कर दी जाती है। मंच सजता है, फोटो और वीडियो बनते हैं, सोशल मीडिया पर प्रचार होता है, परंतु विद्यार्थियों की शैक्षणिक प्रगति पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता।
आज शिक्षा भी एक प्रतिस्पर्धी बाजार का हिस्सा बन चुकी है। संस्थान अपनी “ब्रांडिंग” के लिए आकर्षक कार्यक्रमों और बड़े-बड़े आयोजनों पर जोर देते हैं। बाहरी व्यक्तित्वों को बुलाकर भव्य कार्यक्रम किए जाते हैं ताकि संस्थान की छवि चमके। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या इससे विद्यार्थियों की बौद्धिक क्षमता और विषय-ज्ञान में वास्तविक वृद्धि हो रही है? कई बार आयोजन की तैयारी में शिक्षक और छात्र इतने व्यस्त हो जाते हैं कि नियमित पाठ्यक्रम प्रभावित हो जाता है। असाइनमेंट, प्रायोगिक कार्य और शोध गतिविधियाँ पीछे छूट जाती हैं।
एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि लगातार आयोजनों का दबाव शिक्षकों और कर्मचारियों पर मानसिक तनाव भी बढ़ाता है। उन्हें अपने मूल कार्य के अतिरिक्त मंच संचालन, अतिथि स्वागत, सजावट, प्रबंधन और रिपोर्टिंग जैसे कार्य करने पड़ते हैं। इससे उनकी ऊर्जा और समय का बड़ा भाग प्रशासनिक गतिविधियों में खर्च हो जाता है। परिणामस्वरूप, शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
यह भी सत्य है कि आधुनिक शिक्षा में प्रस्तुतीकरण और व्यवहारिक अनुभव का महत्व बढ़ा है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि शिक्षा केवल दिखावे तक सीमित रह जाए। वास्तविक शिक्षा वह है जो विद्यार्थियों में चिंतनशीलता, नैतिकता और शोध की प्रवृत्ति उत्पन्न करे। यदि संस्थान केवल प्रमाणपत्र, फोटो और सोशल मीडिया पोस्ट तक सिमट जाएँ, तो शिक्षा का मूल उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाएगा।
समाधान यह है कि शिक्षण संस्थान संतुलन बनाएँ। सह-पाठ्यक्रम गतिविधियाँ अवश्य हों, परंतु वे पाठ्यक्रम और शैक्षणिक गुणवत्ता के पूरक बनें, प्रतिस्थापक नहीं। शिक्षकों को उनके मूल कार्य—पठन-पाठन और मार्गदर्शन—पर केंद्रित रहने दिया जाए। प्रशासन को भी यह समझना होगा कि संस्थान की वास्तविक पहचान उसके परिणामों, शोध कार्यों और विद्यार्थियों के नैतिक विकास से बनती है, न कि केवल भव्य आयोजनों से।
अंततः, शिक्षा केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक सतत प्रक्रिया है। यदि हम इसे आयोजन-प्रधान बना देंगे, तो ज्ञान की गहराई और गंभीरता खोने का खतरा रहेगा। इसलिए आवश्यक है कि शिक्षण संस्थान अपनी मूल भावना—ज्ञान, संस्कार और व्यक्तित्व विकास—को केंद्र में रखें और आयोजनों को उसी के अनुरूप सीमित एवं सार्थक बनाएं।

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