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Wednesday, February 25, 2026

बीमार रहने के लिए छुट्टी चाहिए, या छुट्टी के लिए बीमार होना है?

हमारे देश में बीमारी भी बड़ी लोकतांत्रिक चीज़ है — यह कभी भी, कहीं भी, और किसी पर भी आ सकती है। लेकिन शिक्षण संस्थानों में तो बीमारी का स्वरूप कुछ अलग ही दिखाई देता है। यहाँ बीमारी अक्सर मौसम देखकर नहीं, बल्कि टाइम-टेबल देखकर आती है। और खास बात यह कि यह बीमारी छुट्टी के साथ ही ठीक भी हो जाती है।
कहावत है कि “स्वास्थ्य ही धन है”, पर कुछ लोग इसे इस तरह समझ बैठे हैं कि “छुट्टी ही स्वास्थ्य है।” इसलिए छुट्टी मिलते ही उनका स्वास्थ्य खिल उठता है, और काम दिखते ही तबीयत फिर से नाज़ुक हो जाती है।

बीमारी का वैज्ञानिक समय

अगर किसी फैकल्टी का पहला पीरियड सुबह 9 बजे हो, तो उसकी तबीयत रात 8 बजे से ही खराब होने लगती है। व्हाट्सऐप पर मैसेज आता है —
“सर, अचानक तेज बुखार है, आज नहीं आ पाऊँगा।”
और आश्चर्य देखिए, यही बुखार अगले दिन ठीक भी हो जाता है, खासकर तब जब उस दिन दो ही पीरियड हों या कोई मीटिंग न हो।
सबसे अद्भुत बीमारी तब आती है जब कॉलेज में कोई निरीक्षण, अतिरिक्त क्लास या पेपर-सेटिंग का काम हो। तब अचानक स्टाफ में वायरल का ऐसा प्रकोप फैलता है कि मेडिकल साइंस भी चकरा जाए। लगता है जैसे वायरस ने भी प्रशासन से मिलकर काम का कैलेंडर देख लिया हो।
डॉक्टर से ज़्यादा मजबूत मेडिकल सर्टिफिकेट
आजकल असली इलाज दवा से नहीं, मेडिकल सर्टिफिकेट से होता है। कुछ लोग इतने अनुभवी हो चुके हैं कि डॉक्टर से पहले ही बीमारी तय कर लेते हैं —
“डॉक्टर साहब, दो दिन का सर्टिफिकेट दे दीजिए, बाकी दवा मैं खुद ले लूँगा।”
डॉक्टर भी समझ जाते हैं कि यह बीमारी शरीर की कम, मन की ज्यादा है। पर क्या करें, मरीज की इच्छा सर्वोपरि है।

छुट्टी का गणित

शिक्षण संस्थानों में छुट्टी का गणित बड़ा रोचक है।
सोमवार को छुट्टी ले लो, तो रविवार मिलाकर लंबा वीकेंड।
शुक्रवार को छुट्टी ले लो, तो शनिवार-रविवार बोनस।
और अगर बीच में कोई त्योहार आ जाए, तो बीमारी की गंभीरता स्वतः बढ़ जाती है।
यह बीमारी इतनी समझदार होती है कि छुट्टी खत्म होते ही खुद ही ठीक हो जाती है। कोई टेस्ट नहीं, कोई रिपोर्ट नहीं — बस चमत्कार!

छात्रों का भी ज्ञान बढ़ता है

जब शिक्षक ही बीमारी का बहाना बनाकर छुट्टी लेते हैं, तो छात्र भी सीख जाते हैं कि बहाना बनाना भी एक कला है।
छात्र सोचते हैं —
“जब सर की तबीयत हर दूसरे शुक्रवार खराब हो सकती है, तो हमारी भी कभी-कभी हो ही सकती है।”
इस प्रकार शिक्षा केवल किताबों से नहीं, व्यवहार से भी मिलती है। और यह व्यवहार छात्रों को बहानेबाजी का पोस्ट-ग्रेजुएशन करा देता है।

काम का डर या आराम का प्यार?

असल सवाल यह है कि लोग सच में बीमार होते हैं या काम देखकर बीमार हो जाते हैं?
क्योंकि जब वही व्यक्ति स्टाफ रूम में बैठकर चाय पीता है, तो बिल्कुल स्वस्थ दिखता है, लेकिन जैसे ही अतिरिक्त जिम्मेदारी मिलती है, उसकी कमर दर्द करने लगती है, सिर चकराने लगता है, और आँखों में अँधेरा छाने लगता है।
कई बार तो बीमारी का नाम भी बड़ा आधुनिक होता है —
“सर, माइग्रेन हो गया है।”
“सर, एलर्जी है।”
“सर, डॉक्टर ने आराम बताया है।”
डॉक्टर बेचारे सोचते होंगे कि हमने आराम की सलाह कब दी, पर उनका नाम तो लग ही जाता है।
ईमानदार लोग भी परेशान
सबसे ज्यादा परेशानी उन लोगों को होती है जो सच में बीमार होते हैं।
जब वे छुट्टी लेते हैं, तो प्रशासन सोचता है —
“फिर वही बहाना!”
इस तरह बहानेबाजों की वजह से असली मरीजों की साख भी खराब हो जाती है।

प्रशासन की मजबूरी

प्रशासन भी क्या करे?
अगर छुट्टी मना कर दे तो मानवता पर सवाल, और छुट्टी दे दे तो काम पर असर।
इसलिए वह भी आधे मन से छुट्टी मंजूर कर देता है और मन ही मन सोचता है —
“काश, यह बीमारी छात्रों की पढ़ाई में भी थोड़ी गंभीर होती।”
समाधान क्या है?
समाधान बहुत कठिन नहीं है, बस थोड़ी ईमानदारी चाहिए।
अगर सच में बीमारी है तो आराम जरूरी है, लेकिन अगर छुट्टी ही चाहिए तो बीमारी का बहाना बनाना जरूरी नहीं।
कभी-कभी सच्चाई भी छुट्टी दिला सकती है —
“सर, थक गया हूँ, थोड़ा आराम चाहिए।”
कम से कम इससे मेडिकल साइंस को तो दोष नहीं देना पड़ेगा।

निष्कर्ष 

आज शिक्षण संस्थानों में बीमारी केवल स्वास्थ्य की समस्या नहीं रही, बल्कि छुट्टी का माध्यम बन चुकी है।
जब काम बढ़ता है तो बीमारी बढ़ती है, और जब जिम्मेदारी घटती है तो स्वास्थ्य लौट आता है।
इसलिए लगता है कि अब नया नारा होना चाहिए —
“स्वस्थ रहो या बीमार बनो, छुट्टी तो मिलनी ही चाहिए।”
पर सच तो यही है कि अगर शिक्षक ही जिम्मेदारी से भागने लगें, तो शिक्षा का स्वास्थ्य भी बीमार हो जाएगा।
और उस बीमारी का इलाज किसी डॉक्टर के पास नहीं, केवल कर्तव्यनिष्ठा के पास है।

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